Hindi Story 21 – आलसी का भला कोई नहीं कर सकता

किसी गांव में एक ब्राह्मण रहा करता था| वह बड़ा भला आदमी था, लेकिन साथ ही काम को टाला करता था| वह यह मानकर चलता था कि जो कुछ होता है, भाग्य से होता है, वह अपने हाथ-पैर नहीं हिलाता था| वह बहुत आलसी था| एक दिन एक साधु उसके घर आये| ब्राह्मण और उसकी घरवाली ने उसका खूब आदर-सत्कार किया|
साधु ने खुश होकर चलते समय ब्राह्मण से कहा – “तुम बहुत गरीब हो! लो मैं तुम्हें पारस पत्थर देता हूं| सात दिन के बाद मैं आऊंगा और इसे ले जाऊंगा| इस बीच तुम जितना सोना बनाना चाहो, बना लेना|”

ब्राह्मण ने पत्थर ले लिया| साधु चले गये| उनके जाने के बाद ब्राह्मण ने घर में लोहा खोजा, उसे बहुत थोड़ा लोहा मिला| वह उसी को सोना बनाकर बेच आया और कुछ सामान खरीद लाया|

अगले दिन स्त्री के बहुत जोर देने पर वह लोहा खरीदने बाजार में गया तो लोहा कुछ महंगा था| वह घर लौट आया| दो-तीन दिन बाद फिर वह बाजार गया तो पता चला कि लोहा तो अब पहले से भी महंगा हो गया है|

‘कोई बात नहीं|’ उसने सोचा – ‘एकाध दिन में भाव जरूर नीचे आ जाएगा, तभी खरीदेंगे|’

किंतु लोहा सस्ता नहीं हुआ और दिन निकलते गए| आठवें दिन साधु आये और उन्होंने अपना पत्थर मांगा तो ब्राह्मण ने कहा – “महाराज, मेरा तो सारा समय यों ही निकल गया| अभी तो मैं कुछ भी सोना नहीं बना पाया| आप कृपा करके इस पत्थर को कुछ दिन मेरे पास और छोड़ दीजिए|”

लेकिन साधु राजी नहीं हुवे| उन्होंने कहा – “तुझ जैसा आदमी जीवन में कुछ नहीं कर सकता| तेरी जगह और कोई होता तो कुछ-का-कुछ कर डालता| जो आदमी समय का उपयोग करना नहीं जानता वह कभी सफल नहीं होता|”
ब्राह्मण पछताने लगा, पर अब क्या हो सकता था| साधु पत्थर लेकर जा चुके थे| उसे अपने आलस और भाग्य पर जरूरत से ज्यादा यकीन की कीमत चुकानी पड़ी।

आलस आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन होता| ईश्वर प्रदत्त अनेक अवसर प्रायः इस टालमटोल और आलस के रवय्ये के भेंट चढ जाते हैं।
जय रामजी की!!

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