Hindi Story 19 – प्रारब्ध (पूर्व में किया जाने वाला कार्य)

एक व्यक्ति हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करता था। धीरे धीरे वह काफी बुजुर्ग हो चला था इसीलिए एक कमरे में ही पड़ा रहता था। जब भी उसे शौच-स्नान आदि के लिये जाना होता तो वह अपने बेटे को आवाज लगाता था और बेटा उसे ले जाता। धीरे धीरे कुछ दिन बाद बेटा कई बार आवाज लगाने के बाद भी कभी आता और देर रात तो कई बार वो आता ही नही था। और उस रात गंदे बिस्तर पर ही उनकी रात बीतती थी।

अब ज्यादा बुढ़ापा होने के कारण उन्हें कम दिखाई देने लगा था। एक रात को निवृत्त होने के लिये जैसे ही उन्होंने आवाज लगायी तो तुरन्त लड़का आया और बड़े ही कोमल स्पर्श के साथ उनको निवृत्त करवाकर बिस्तर पर लेटाकर गया। धीरे धीरे ये रोज का ही नियम बन गया था। एक रात उनको शंका हुई कि पहले तो बेटा रात में कई कई बार आवाज लगाने पर भी नही आता था लेकिन अब तो ये आवाज लगाते ही क्षण भर में आ जाता है और बड़े ही कोमल स्पर्श से सब निवृत्त करवा करके जाता है। तो उस रात वह व्यक्ति उसका हाथ पकड लेता है और पूछता है कि सच बता! तू कौन है ? मेरे बेटा तो ऐसा नही है।

तभी अंधेरे कमरे में एक अलौकिक उजाला हुआ और उस लड़के रूपी ईश्वर ने अपना वास्तविक रूप दिखाया। वह व्यक्ति रोते हुये कहने लगा, “हे प्रभु! आप स्वयं मेरे निवृत्ती के कार्य कर रहे है। यदि मुझसे इतने प्रसन्न हो तो मुक्ति ही दे दो ना।

तो प्रभु कहने लगे – “जो आप भुगत रहे है वो आपके प्रारब्ध है। आप मेरे सच्चे साधक है; हर समय मेरा नाम जप करते है इसलिये मै आपके प्रारब्ध भी आपकी सच्ची साधना के कारण स्वयं कटवा रहा हूँ।

व्यक्ति कहने लगा’ “क्या मेरे प्रारब्ध आपकी कृपा से भी बडे है? क्या आपकी कृपा मेरे प्रारब्ध नही काट सकती है??

प्रभु आगे कहते है – “मेरी कृपा सर्वोपरि है। ये अवश्य आपके प्रारब्ध काट सकती है। लेकिन फिर अगले जन्म मे आपको ये प्रारब्ध भुगतने फिर से आना होगा। यही कर्म नियम है। इसलिए आपके प्रारब्ध मैं स्वयं अपने हाथों से कटवा कर इस जन्म-मरण से आपको मुक्ति देना चाहता हूँ।

ईश्वर कहते है – “प्रारब्ध तीन तरह के होते है। मन्द, तीव्र तथा तीव्रतम।

मन्द प्रारब्ध मेरा नाम जपने से कट जाते है। तीव्र प्रारब्ध किसी सच्चे संत का संग करके श्रद्धा और विश्वास से मेरा नाम जपने पर कट जाते है पर तीव्रतम प्रारब्ध भुगतने ही पडते है। लेकिन जो हर समय श्रद्धा और विश्वास से मुझे जपते हैं; उनके प्रारब्ध मैं स्वयं साथ रहकर कटवाता हूँ और तीव्रता का अहसास नहीं होने देता हूँ।

प्रारब्ध पहले रचा,
पीछे रचा शरीर!
तुलसी चिन्ता क्यों करे,
भज ले श्री रघुबीर!!

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